भक्ति

दुःखी आशा से ईश्वर में भक्ति रखता है, सुखी भय से ।

दुःखी पर जितना ही अधिक दुःख पड़े, उसकी भक्ति बढ़ती जाती है ।

सुखी पर दुःख पड़ता है, तो वह विद्रोह करने लगता है ।

वह ईश्वर को भी अपने धन के आगे झुकाना चाहता है ।

आदत की तृष्णा…

आदत की तृष्णा पूरी करने में जितना कम समय लगे,
उतनी ही वो आदत दृढ़ होती जाती है।
इसलिए बुरी आदत की तृष्णा को जितना कठिन कर सके,
उतनी ही वो आदत दूर होती जाती है।

ऊपरी आमदनी…

मासिक वेतन तो पूर्णमाशी का चाँद है , जो एक दिन दिखाई देता है और घटते घटते लुप्त हो जाता है!
ऊपरी आये बहता हुआ श्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझिती है!
मासिक वेतन मनुष्य देता है, इसीसे उसमे व्रद्धि नहीं होती!
ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसीसे बरकत होती है!

-प्रेमचंद